संपादकीय अमेरिका के नए टैरिफ का असर क्या भारत के दवा निर्यात के सामने खड़ा हो गया बड़ा संकट? भा
देशों को जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति करता है। वर्ष 2025 में भारत ने अमेरिका को 9.7 अरब डॉलर की दवाओं का निर्यात किया। अमेरिका ने भारत समेत विभिन्न देशों पर शुल्क नीति के जरिए दबाव बनाने की कोशिशें फिर तेज कर दी हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एलान किया है कि अमेरिका आयातित जेनेरिक दवाओं पर अगस्त, 2028 से शुल्क लगाएगा, जो पहले वर्ष 100 फीसद और उसके बाद 200 फीसद हो जाएगा।
यही नहीं, बीते गुरुवार को ट्रंप ने भारत सहित 16 अन्य देशों से आयातित वस्तुओं पर 10 फीसद अतिरिक्त शुल्क की भी घोषणा की है। हालांकि, अमेरिका की ओर से इस पर कई तरह के तर्क दिए जा रहे हैं, लेकिन इन कदमों को पूर्व में अदालत से खारिज हुए भारी- भरकम शुल्क लगाने के फैसले को नए रूप में लागू करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका के इस निर्णय का निश्चित रूप से भारत के दवा निर्यात पर असर पड़ेगा, क्योंकि वह अमेरिका को जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा निर्यातक है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारत आने वाले दिनों में इस चुनौती से कैसे निपटेगा? गौरतलब है कि अमेरिका की ओर से पिछले साल भारत पर 50 फीसद शुल्क लगाए जाने से देश के निर्यात कारोबार पर काफी असर पड़ा था। हालांकि, बाद में अमेरिका की शीर्ष अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले को रद्द कर दिया था।
अब अमेरिका ने जेनेरिक दवाओं के आयात पर भारी-भरकम शुल्क लगाने का फैसला किया है। जानकारों का मानना है कि ट्रंप रणनीतिक रूप से अपनी शुल्क नीति को जिंदा रखना चाहते हैं। भारत की बात की जाए, तो उसे ‘दुनिया का दवाखाना’ भी कहा जाता है, क्योंकि वह अनेक देशों को जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति करता है।
वर्ष 2025 में भारत ने अमेरिका को 9.7 अरब डॉलर की दवाओं का निर्यात किया। यह उसके कुल वैश्विक औषधि निर्यात 25.8 अरब डॉलर का करीब 38 फीसद है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अमेरिका के इस कदम का भारत के निर्यात पर कितना असर पड़ सकता है।
ऐसे में भारत को वैकल्पिक उपाय के तौर पर निर्यात में अमेरिका पर निर्भरता कम करनी होगी। साथ ही यूरोप, लैटिन अमेरिका, अप्रीका और एशियाई देशों में दवा निर्यात बढ़ाने की संभावनाएं तलाशने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। अमेरिका ने भारत को टैरिफ के मामले में राहत देते हुए 10 प्रतिशत शुल्क वाली श्रेणी में रखा है।
इससे पहले भारत को 12.5 प्रतिशत टैरिफ वाले उच्च श्रेणी में शामिल किए जाने पर विचार किया जा रहा था। अधिकारियों के मुताबिक, श्रम मानकों (लेबर प्रैक्टिसेज) को लेकर भारत-अमेरिका के बीच हुई सकारात्मक बातचीत के बाद यह फैसला लिया गया।
