सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

निगम के फैसले से मच गया बवाल

अब 1 लाख रु. से कम की राशि चेक के माध्यम से नहीं की जा सकेगी जमा

कांग्रेस के नेताओं ने ली निगम के फैसले पर आपत्ति

नगर निगम के द्वारा लिए गए एक फैसले से बवाल मच गया है। निगम के द्वारा यह फैसला लिया गया है कि अब 1 लाख रु. से कम की राशि चेक के माध्यम से जमा नहीं की जा सकेगी। इस फैसले पर कांग्रेस के नेताओं ने आपत्ति भी ली है। इंदौर नगर निगम के द्वारा नागरिकों से बकाया टैक्स वसूल करने के लिए अभियान चलाया जाता है।

इस अभियान के दौरान बहुत से नागरिकों के द्वारा अपनी बकाया राशि का टैक्स चेक के रूप में दे दिया जाता है। यह चेक लेने के बाद नगर निगम के द्वारा संबंधित व्यक्ति की संपत्ति को सील करने जैसी कोई अन्य कार्रवाई नहीं की जाती है। निगम के अधिकारियों का कहना है कि यह देखने में आता है कि बहुत से लोगों के द्वारा स्वयं को और संपत्ति को कार्रवाई से बचने के लिए चेक तो दे दिया जाता है लेकिन बाद में खाते में बैलेंस नहीं होने के कारण बैंक के द्वारा यह चेक अमान्य कर दिया जाता है।

इस तरह के बाउंस होने वाले चेक के कारण नगर निगम के राजस्व विभाग के अधिकारी परेशान है। इस स्थिति में नगर निगम के द्वारा 2 साल पहले एक प्रावधान करते हुए यह नियम बना दिया गया था कि यदि किसी का चेक बाउंस होगा तो संबंधित व्यक्ति पर जुर्माना लगाया जाएगा। अब निगम के अधिकारियों का कहना है कि एक बार चेक बाउंस होने के बाद संबंधित व्यक्ति से टैक्स की राशि वसूल करना ही मुश्किल हो जाता है।

इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए नगर निगम के द्वारा अब एक आदेश जारी कर 1 लाख रु. से कम के टैक्स की राशि को चेक के माध्यम से जमा करने पर रोक लगा दी गई है। इस रोक को लगाने के आदेश को तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है। नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष सोनिला मिमरोट ने नगर निगम के द्वारा यह नियम लागू किए जाने का विरोध किया है। उनका कहना है की बड़ी संख्या में नागरिकों के द्वारा चेक की।

साथ हम हर परिस्थिति में खड़े हैं।

अन्य मौजूद थे। के माध्यम से ही यह राशि जमा की जाती है। अब नगर निगम का कहना है यह राशि केश में जमा करो। तो ऐसे में यदि व्यक्ति बैंक में जाकर पैसे निकलवाएगा और फिर निगम में लाकर जमा करवाएगा तो रास्ते में यदि कहीं कोई घटना हो गई और इस व्यक्ति से पैसे लूट लिया गए तो उसके लिए जिम्मेदार कौन होगा। उनका कहना है कि निगम के अधिकारियों को इस तरह का फैसला नहीं लेना चाहिए। ऐसा फैसला लेने से पहले पार्षदों को विश्वास में लिया जाना चाहिए।

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