संपादकीय योजनाएं कई, फिर भी स्कूल छोड़ रहीं बेटियां, 9वीं-10वीं में सबसे ज्यादा ड्रॉपआउट स
की दर सबसे अधिक 15.6 फीसदी दर्ज की गई। शिक्षा किसी भी देश के आर्थिक और सामाजिक विकास का आधार स्तंभ होती है। यह भी जरूरी है कि शिक्षा में अमीर- गरीब, जाति, धर्म, क्षेत्र या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए ताकि सबको सामान अवसर मिल सके।
यह सच है कि भारत के शिक्षित समाज में पिछले कुछ दशकों से महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है लेकिन चुनौतियां अभी बरकरार हैं। हाल ही में संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, साल 2025-26 में देश भर में नौवीं और दसवीं कक्षा के स्तर पर लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर 8 फीसदी रही जो अन्य कक्षाओं के मुकाबले सबसे अधिक है। यह हाल तब है जब सरकार की ओर से कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और समग्र शिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रम एवं योजनाएं शुरू की गई हैं।
सवाल है कि जब सबको शिक्षा के समान और सुलभ अवसर मुहैया कराने की नीतियां लागू की जाती हैं तो लक्ष्य को पूरा करने की प्रतिबद्धता बीच रास्ते में ही दम क्यों तोड़ देती है? इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जब एक महिला शिक्षित होती है तो इसका प्रकाश पूरे परिवार को आलोकित करता है। योग्यता की बात की जाए तो देश में हर साल स्कूली बोर्ड परीक्षाओं में लड़कियां अव्वल रहती हैं।
इसके बावजूद अगर उन्हें किसी कारणवश माध्यमिक स्तर पर ही स्कूल छोड़ने को विवश होना पड़े तो इसे व्यवस्था की नाकामी नहीं तो और क्या कहा जाएगा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल लद्दाख में माध्यमिक स्तर पर लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर सबसे अधिक 15.6 फीसदी दर्ज की गई। इसके बाद असम और कर्नाटक का स्थान है जहां यह दर 13.9 फीसदी रही।
इसके पीछे कई कारण बताए गए हैं जिनमें लड़कियों का घरेलू कार्यों और आर्थिक मामलों में परिवार का सहयोग करने के लिए स्कूल छोड़ देना या फिर माता-पिता का उनकी आगे की शिक्षा को जरूरी न समझना भी शामिल है।
