सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

संपादकीय बच्चे ऑनलाइन फंसते गए, सोशल मीडिया कमाता गया सवालों के घेरे में मेटा मे

कानून का उल्लंघन है। बच्चे सिर्फ मनोरंजन के लिए हर हफ्ते औसतन 32 घंटे डिजिटल स्क्रीन के सामने बिताते हैं। जो कुछ वर्षों से आभासी दुनिया में बच्चे जिस तरह गुम हो गए दिखते हैं, वहां से उनको निकालना एक बड़ी चुनौती है। आज पूरे विश्व में करोड़ों बच्चे सोशल मीडिया की लत से प्रभावित हैं।

वे न केवल समाज से, बल्कि परिवार से भी कट गए हैं। सवाल है कि यह आदत उन्हें लगी या लगाई गई? आभासी दुनिया में विविध मंच उपलब्ध कराने वाली मेटा इस मुद्दे पर कठघरे में है। गौरतलब है कि अमेरिका के चार राज्यों ने इसके संचालन में बदलाव की मांग की है।

बच्चों की सुरक्षा और निजता पर उठ रहे सवाल बेहद गंभीर प्रकृति के हैं और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संबंधित राज्यों ने मेटा के खिलाफ संघीय अदालत में आरोप लगाया है कि उसने अपने ऐप इस तरह बनाए हैं कि वे बच्चों को आदी बनाएं और उन्हें ज्यादा समय तक रोके रखें तथा उनका डेटा जमा करें। मेटा तेरह वर्ष से कम उम्र के बच्चों का अभिभावकों की सहमति के बिना डेटा जमा करती है, जो संघीय कानून का उल्लंघन है।

हालांकि मेटा ने अपना बचाव किया है, लेकिन उसकी दलीलें कमजोर दिखाई दे रही हैं। सवाल है कि अगर मेटा के विविध मंचों पर बच्चों की उपस्थिति अप्रत्याशित तरीके से बढ़ रही थी, तो उसे सहज क्यों मान लिया गया और समय रहते जरूरी कदम क्यों नहीं उठाए गए। यों मेटा समय-समय पर अनुभव को सुरक्षित बनाने वाली सुविधाएं शुरू करने की बात कहती रही है, लेकिन सच यह है कि ये सुविधाएं कभी प्रभावी नहीं थीं।

इस समय विविध मंचों पर जिस तरह की सामग्री परोसी जा रही है, उसे रोकने का किसी स्तर पर प्रयास नहीं दिखता। मेटा की मुश्किलें कम होती इसलिए नहीं दिख रही हैं, क्योंकि उसी के एक पूर्व अधिकारी ने गवाही दी है कि कंपनी ने अपने मंचों से कम उम्र के बच्चों को लेकर ‘पूछो मत, बताओ मत’ वाले रवैये को अपनाया और सुरक्षा की तुलना में मुनाफे को प्राथमिकता दी। अब मेटा जो भी सफाई दे, लेकिन यह सच है कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर इसका नकारात्मक असर पड़ा है।

संघीय अदालत में चल रहा मुकदमा इसलिए भी अहम है कि इस पर पूरी दुनिया की नजर है। यह मुद्दा करोड़ों बच्चों के भविष्य से जुड़ा है।