2026 विवाद के बाद शिक्षा व्यवस्था में सुधार की चुनौती ज
न करे। के प्रति ईमानदार इच्छाशक्ति के साथ सरकार कदम आगे बढ़ाए। एक स्वस्थ लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि अगर किसी मसले पर सरकार के रुख की वजह से जनता के बीच असंतोष और विरोध की भावना बढ़ रही हो, तो सरकार को इस पर विचार करना चाहिए।
इस लिहाज से देखें तो पिछले कुछ समय से नीट 2026 में प्रश्नपत्र लीक होने के मसले पर लोगों के भीतर उभरे व्यापक क्षोभ और विरोध के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का आखिर इस्तीफा देना लोकतांत्रिक परंपरा की ही अगली कड़ी है। हालांकि सरकार ने अगर इस संबंध में समय रहते ठोस फैसला किया होता और जनता के बीच स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की होती, तो शायद लोगों के बीच आक्रोश का दायरा इतना नहीं फैलता, जिसने सरकार की मंशा पर गहरे सवाल उठाए।
प्रश्नपत्र लीक होने की घटना के उजागर होने के बाद से ही समूचा सरकारी तंत्र एक तरह से कठघरे में खड़ा था और लोगों ने सरकार से जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ ठोस कार्रवाई की मांग की थी। मगर सरकार ने इस मसले पर तब तक उपेक्षा और उदासीनता का रुख अपनाए रखा, जब तक काकरोच जनता पार्टी के आह्वान के बाद दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में इस मुद्दे पर व्यापक जनांदोलन नहीं खड़ा हो गया। विचित्र यह भी है कि प्रश्नपत्र लीक होने की घटना की गंभीरता और उस पर लोगों के बीच पसरते आक्रोश की तीक्रता का अंदाजा होने के बावजूद सरकार ने न तो ठोस कार्रवाई करने का संकेत दिया और न ही आंदोलन के लिए सड़क पर उतरे विद्यार्थियों से संवाद कायम करने की कोशिश की।
इसके उलट जंतर मंतर पर जमे प्रदर्शनकारियों ने जब ‘संसद मार्च’ के आह्वान के जरिए अपनी मांग और आवाज को आगे बढ़ाना चाहा, तो उन्हें रोकने के लिए सरकार ने एक तरह पुलिस को खुला छोड़ दिया गया। नतीजतन, पुलिस ने हर मानवीय तकाजे को ताक पर रख कर प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले छोड़े और बेरहमी से लाठीचार्ज किया। सरकार का यह रवैया लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों को चोट पहुंचाने वाला था।
इसी के बाद न केवल दिल्ली में, बल्कि देश के कई राज्यों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। यह एक तरह से इस समूचे मुद्दे पर सरकार के अपरिपक्व रवैये का सबूत था, जिसके तहत आंदोलनकारियों से संवाद करके समस्या का समाधान निकालने के बजाय बल प्रयोग के जरिए उनका दमन करने की कोशिश की गई। जाहिर है, सरकार का यह रुख एक और अलोकतांत्रिक तथा गैरजिम्मेदार कदम के रूप में देखा गया और सवाल उठे कि क्या इस तरह असहमत होने और विरोध करने के संवैधानिक अधिकारों का दमन किया जा रहा है।
जबकि विद्यार्थियों के असंतोष की अभिव्यक्ति दरअसल लंबे समय से इस मसले पर सरकार की उदासीनता और बार-बार परीक्षाओं के आयोजन में गड़बड़ी से लेकर समावेशी शिक्षा के सिद्धांत की अनदेखी से उपजी स्थिति थी। अब देर से सही, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा आना जिम्मेदारी तय किए जाने की प्रक्रिया का एक उदाहरण है। इसके बाद अब शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी प्रल्हाद जोशी को सौंपी गई है, लेकिन जरूरत इस बात की है कि न केवल परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक होने, बल्कि व्यापक शैक्षिक सुधारों के प्रति ईमानदार इच्छाशक्ति के साथ सरकार कदम आगे बढ़ाए।
इसके अलावा, आंदोलन और विरोध प्रदर्शन को लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का स्वाभाविक हिस्सा मानते हुए सरकार अब आगे परीक्षाओं के आयोजन में सभी स्तर पर शुचिता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के मामले में कोई समझौता
