सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

जांच होती है, रिपोर्ट आती है फिर हादसे क्यों नहीं रुकते? आ

जो हादसे की स्थिति में काम करना बंद कर देते हैं और उसमें लोग फंस कर मारे जाते हैं। आग और धुएं से घिरी एक बहुमंजिला इमारत तथा बचाव अभियान का प्रतीकात्मक दृश्य, जो भवन सुरक्षा, प्रशासनिक लापरवाही और हादसों में जवाबदेही के मुद्दे को दर्शाता है। बार-बार होने वाले भवन हादसे केवल निर्माण की खामियों ही नहीं, बल्कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी और प्रशासनिक जवाबदेही के संकट को भी उजागर करते हैं।

आमतौर पर किसी हादसे के बाद उसके कारणों पर बात होती है। सरकार मामले की तह तक पहुंचने के लिए जांच एजेंसी गठित करती है। मगर उसके बाद शायद ही कभी कारणों के तमाम पहलुओं के आधार पर हादसों से निपटने के लिए कोई व्यापक कार्ययोजना बनती है और उसे एक नियमन की तरह देखा जाता है।

लगभग सभी दुर्घटनाओं और उनकी जांच रिपोर्ट को एक खास घटना के दायरे में समेट कर देखा जाता है। जबकि सबसे जरूरी यह होना चाहिए कि किसी हादसे के बाद उसके कारणों को ध्यान में रख कर भविष्य के लिए ऐसे इंतजाम किए जाएं, ताकि वैसा दोबारा न हो। एक अहम पहलू यह भी है कि हमारे यहां हादसों के बाद संवेदना जाहिर करने से लेकर सवाल उठाने तक में तो कमी नहीं की जाती, लेकिन उससे बचाव के पूर्व-इंतजामों को लेकर शायद ही कभी गंभीरता दिखाई जाती है।

यही वजह है कि एहतियाती उपायों की अनदेखी आखिर किसी बड़ी दुर्घटना का कारण बनती है और उसमें जानमाल की क्षति होती है। कुछ समय पहले दिल्ली और लखनऊ की दो अलग-अलग घटनाओं ने इस मसले पर सरकारी महकमों की उदासीनता और लापरवाही की एक अघोषित तौर पर चलती रहने वाली उस ‘व्यवस्था’ को उजागर किया, जो ऐसे हादसों की मूल वजह है। दरअसल, दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में एक इमारत में लगी आग में फंसने के बाद जहां इक्कीस लोगों की जान चली गई, वहीं लखनऊ के एक कोचिंग संस्थान में इसी तरह की घटना में पंद्रह विद्यार्थियों की मौत हो गई।

निश्चित तौर पर इसके लिए उन इमारतों के प्रबंधन की जवाबदेही बनती है, लेकिन सवाल है कि जिन लापरवाहियों या खामियों की वजह से वे भयावह हादसे हुए, उनकी जांच करने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी? कायदे से इसके लिए उन सरकारी महकमों और अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, जिनका दायित्व है कि वे समय-समय पर इमारतों में अग्निशमन से लेकर बचाव इंतजामों की जांच करें। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और लखनऊ में आग लगने की घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए गुरुवार को नगर निकायों को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि समय-समय पर दिए गए निर्देशों का पालन न करने वाले शीर्ष अधिकारी अब व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे।

अदालत की यह टिप्पणी बेहद अहम है कि हादसों के बाद सिर्फ भवन निर्माताओं को गिरफ्तार किया जाता है, जबकि घटना वाले क्षेत्र के अधिकारियों को छोड़ दिया जाता है। यह छिपा नहीं है कि किसी इमारत में आग लगने की वजह से अगर लोग मारे जाते हैं, तो उसकी मुख्य वजह बचाव के इंतजामों को ताक पर रख देना होता है। मसलन, अचानक आग लगने की स्थिति में उसे बुझाने या उससे बचने के लिए वैकल्पिक निकास की ठोस व्यवस्था न होना लोगों की जान जाने की सबसे बड़ी वजह होती है।

आजकल कई इमारतों में सुरक्षा के आधुनिक इंतजाम के नाम पर ‘डिजिटल दरवाजे’ लगा दिए जाते हैं, जो हादसे की स्थिति में काम करना बंद कर देते हैं और उसमें लोग फंस कर मारे जाते हैं। सवाल है कि अग्निशमन से लेकर बचाव के तमाम उपायों को सख्ती से लागू कराना किसकी जिम्मेदारी है। इसलिए यह बिल्कुल उचित सवाल है कि केवल इमारतों के मालिकों या प्रबंधकों को कठघरे में खड़ा करना काफी नहीं है, बल्कि हादसे की मुख्य जड़ यानी संबंधित महकमे और शीर्ष अधिकारियों की लापरवाही और अनदेखी का इलाज करना जरूरी है।