बाजारों में सन्नाटा, ग्राहक कहां है? -अक्षय जैन
बाजार खुले हैं, दुकानें सजी हैं, गोदाम माल से भरे हैं लेकिन ग्राहक कहां है? दुकानदार करोड़ों की पूंजी स्टॉक में फंसाकर बैठा है और शाम को बिक्री का हिसाब देखकर चिंता बढ़ती जा रही है। हालत यह है कि कई व्यापारी अब कारोबार से नहीं, घर की जमा पूंजी से परिवार चला रहे हैं।
फिर सवाल उठता है क्या यह मंदी केवल व्यापारी की निजी समस्या है? किसान की फसल खराब हो तो मुआवजा, उद्योग संकट में हो तो पैकेज और प्रोत्साहन; लेकिन बाजार में महीनों बिक्री न हो, पूंजी फंस जाए और कारोबार घाटे में चला जाए तो व्यापारी के हिस्से में क्या आता है? सिर्फ टैक्स की देनदारी और सरकारी नोटिस?
सरकार अर्थव्यवस्था की सफलता का हिसाब टैक्स संग्रह से लगाती है। लेकिन टैक्स तब बनता है जब कारोबार होता है। बाजार में बिक्री नहीं होगी तो कल टैक्स भी नहीं होगा। इसलिए खजाना भरने से पहले यह देखना जरूरी है कि बाजार की सांस चल भी रही है या नहीं।
आज व्यापारी तीन तरफ से दबाव में है घटती ग्राहक क्षमता, बढ़ती लागत और ऑनलाइन-बड़े कारोबार की प्रतिस्पर्धा। इसके बावजूद नीति निर्माण में उसका संकट प्राथमिकता नहीं बनता। व्यापारी की एक कमजोरी भी है। उसने कभी अपनी आर्थिक ताकत को संगठित राजनीतिक ताकत में नहीं बदला।
वह देशप्रेम, धर्म और सामाजिक जिम्मेदारी में आगे रहा, लेकिन अपने आर्थिक हितों के लिए निर्णायक आवाज नहीं बना सका। लोकतंत्र में शायद यही सबसे बड़ी विडंबना है जो वर्ग रोज अर्थव्यवस्था को चलाता है, वही अपने संकट को सबसे कम राजनीतिक महत्व दिला पाता है। अब सरकार को आंकड़ों के भ्रम से बाहर निकलना होगा।
‘टैक्स कितना आया’ के साथ ‘बिक्री कितनी हुई’ और ‘ग्राहक कितना खर्च कर रहा है’ यह भी पूछा जाए। क्योंकि दुकान में पड़ा माल अर्थव्यवस्था की ताकत नहीं, फंसी हुई पूंजी है और बाजार में पसरा सन्नाटा सिर्फ व्यापारी का दर्द नहीं यह उस अर्थव्यवस्था की चेतावनी है, जिसमें उत्पादन तो हो रहा है, लेकिन खरीदने की ताकत कमजोर पड़ रही है। सवाल अब यह नहीं कि बाजार कब सुधरेगा। सवाल यह है सरकार बाजार की बिगड़ती हालत को गंभीरता से कब मानेगी?
