देश में चीनी महंगी क्यों हुई, गन्ना उत्पादन में कमी या फिर एथनॉल है कारण? गौ
स्थान पर है। देश भर में चीनी के दामों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी ने त्योहारी मौसम की मिठास में महंगाई की कड़वाहट घोल दी है। चीनी की कीमतें क्यों बढ़ीं, इसके अलग-अलग तर्क दिए जा रहे हैं। सरकार का कहना है कि गन्ने की कमी से चीनी का उत्पादन प्रभावित हुआ, जिससे दाम बढ़े हैं।
वहीं, चीनी उद्योग का तर्क है कि कीमतें बढ़ने की उम्मीद में कारोबारियों एवं थोक व्यापारियों की ओर से की गई ज्यादा खरीदारी भी एक कारण हो सकता है। मगर विपक्षी दल इन तर्कों से इत्तिफाक नहीं रखते, उनका आरोप है कि गन्ने का एथनाल उत्पादन में इस्तेमाल बढ़ाने से चीनी की कीमतें बढ़ रही हैं। वजह चाहे कोई भी हो, लेकिन यह बात साफ है कि इसका असर आम उपभोक्ता के घरेलू बजट पर पड़ रहा है।
सवाल है कि आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रण में रखने की जिम्मेदारी किसकी है? हालांकि, सरकार की ओर से दस लाख टन कच्ची चीनी का शुल्क-मुक्त आयात करने की बात कही जा रही है, लेकिन यह निर्णय अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। गौरतलब है कि भारत चीनी की घरेलू आपूर्ति के साथ-साथ इसके निर्यात के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर है।
इसके बावजूद अगर देश में चीनी आयात करनी पड़े, तो इसे किस तरह देखा जाएगा। विपक्ष का आरोप है कि देश में चीनी का भंडार नौ साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है, जबकि सरकार का दावा है कि घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त भंडार मौजूद है। मगर सवाल यह भी है कि अगर सरकार का दावा सही है, तो फिर चीनी की कीमतें क्यों बढ़ी हैं?
इसका जवाब सरकार के उन नए दिशा-निर्देशों में भी ढूंढ़ा जा सकता है, जिनके तहत चीनी के बड़े कारोबारियों, शीतल पेय, मिठाई एवं आइसक्रीम विनिर्माताओं और थोक उपभोक्ताओं के लिए भंडारण सीमा लागू की गई है। यानी सरकार को लगता है कि चीनी की कालाबाजारी से भी इसके दामों में बढ़ोतरी हो रही है। मगर यह बात समझ से परे है कि संकट आने के बाद ही सरकार की ओर से ऐसे कदम क्यों उठाए जाते हैं?
कालाबाजारी के खिलाफ कानून होने के बावजूद उसे सख्ती से लागू करने की जरूरत क्यों महसूस नहीं की जाती! सवाल सिर्फ कीमतों का ही नहीं है, बल्कि सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े निजी उपक्रमों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता का भी है। देश भर के खुदरा और थोक बाजारों में चीनी की कीमतों में एक माह के भीतर करीब पच्चीस फीसद की बढ़ोतरी देखी गई है।
इसको लेकर विरोधाभासी दावों ने भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। एक ओर विपक्ष इसे पेट्रोल में एथनाल मिश्रण बढ़ाने की सरकारी नीति से जोड़कर देख रहा है, तो दूसरी तरफ सरकार का दावा है कि देश में कुल एथनाल का केवल एक- चौथाई हिस्सा ही गन्ने से बनता है, जबकि बाकी मुख्य रूप से मक्का जैसे अनाज से तैयार होता है।
