संपादकीय सड़कों पर पसरा असंतोष
सिक स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को ेकर प्रदर्शन कर रहे मेडिक (एमबीबीएस) इंटर्न्स पर भोपा में वॉटर कैनन चाया गया। पांच सा की महंगी पढ़ाई करने और अनियमित घंटों तक काम करने के बाद इन डॉक्टरों को हर महीने फिहा 14,337 की वृत्ति मिती है। इस रकम पर युवा डॉक्टर किस तरह गुजारा चाते होंगे, इसकी कल्पना की जा सकती है।
स्टाइपेंड को 30 हजार रुपये करने की मांग को ेकर भोपा के गांधी मेडिक कॉेज अस्पता के इंटर्न मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ रहे थे, तब पानी की बौछार कर उन्हें तितर-बितर कर दिया गया। इस घटना के विरोध में राज्य के कई सरकारी मेडिक कॉेज अस्पताों में ओपीडी सहित अन्य सेवाएं प्रभावित हुईं। उधर हरियाणा में करीब 12,000 अतिथि अध्यापक ढाई महीने से भी अधिक समय से कुरुक्षेत्र स्थित सचिवाय के बाहर मोर्चा गाए हुए हैँ।
ये शिक्षक क्रमिक भूख हड़ता पर हैं। मुख्यमंत्री आवास के घेराव के साथ-साथ विधायकों को ज्ञापन सौंप चुके हैं। यानी जिन शिक्षकों को कास में मौजूद रह कर बच्चों का शिक्षण करना चाहिए, वे प्रतिरोध के अग- अग माध्यमों से अपने भविष्य की ड़ाई ड़ रहे हैं।
इनमें से अनेक शिक्षक 20 सा से ज्यादा समय से ‘अतिथि’ रूप में ही अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जिन्हें नियमित शिक्षकों की तुना में गभग एक तिहाई पारिश्रमिक मिता है। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने नियमित किए जाने की उनकी मांग को जायज माना। ेकिन सरकार इसे टाती ची गई है।
ये दोनों आंदोन देश में स्वास्थ्य एवं शिक्षा क्षेत्र के मौजूदा हा की मिसा हैँ। वे वो अहम क्षेत्र हैं, जिन्हें किसी समाज के विकास की बुनियाद समझा जाता है। मगर आज हा यह है कि सरकारों के पास बजट ना होने का तर्क है। इसिए ऐसे तमाम महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को कामचाऊ ढंग से चाने की रस्म- अदायगी सामान्य बात हो गई है।
मुद्दा है कि बजट क्यों नहीं है? क्या इसके िए खुद सरकारी नीतियां जिम्मेदार नहीं हैं? दरअस, शिक्षा एवं स्वास्थ्य क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर के िए तमाम उदारता दिखाने वाी सरकारें जब ऐसी बातें कहती हैं, तो उनकी विश्वसनीयता स्वतः संदिग्ध हो जाती है।
