सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

गरीबी से लड़कर झंडू कुमार ने जीता पदक, बोले- लग रहा है हवा में हूं

ग्लासगो। कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचने वाले भारतीय पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार अपनी इस उपलब्धि के बाद बेहद भावुक नजर आए। यह उनके करियर का पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय पदक है। पदक जीतने के बाद उन्होंने अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे वह 'हवा में उड़ रहे हों।' उन्होंने बताया कि पूरे मुकाबले के दौरान उनके मन में सिर्फ एक ही लक्ष्य था कि हर हाल में पदक जीतना।

जैसे मैं उड़ रहा हूं। यह मेरा पहला मेडल है। पूरे मुकाबले के दौरान मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही बात चल रही थी कि मुझे मेडल जीतना है। बस जीतना है।' उन्होंने कहा कि यह पदक उनके लिए सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की मेहनत का परिणाम है जिन्होंने उनके सफर में हर कदम पर उनका साथ दिया।

अभ्यास करने का मौका दिया और हमेशा प्यार व समर्थन दिया। आज मैं बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूं। भविष्य में इससे भी बेहतर प्रदर्शन करने की कोशिश करूंगा।'

संघर्ष से सफलता की कहानी

झंडू कुमार की यह उपलब्धि पूरे भारत के लिए खास है। बिहार के रहने वाले झंडू एक सब्जी विक्रेता के बेटे हैं और अपने परिवार की मदद के लिए उन्होंने खुद भी सब्जियां बेचीं। बाद में उन्होंने जीविका के लिए ई-रिक्शा भी चलाया। उन्होंने 181 और 190 किलोग्राम के सफल लिफ्ट लगाए और कुल 130.9 अंक हासिल किए। हालांकि उनका 196 किलोग्राम का अंतिम प्रयास सफल नहीं हो सका।

अब गोल्ड मेडल पर है लवलीना बोरगोहेन का ध्यान

नई दिल्ली। टोक्यो ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता भारतीय मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन ने कॉमनवेल्थ गेम्स में इतिहास रचते हुए बिना एक भी पंच मारे भारत के लिए पहला मेडल पक्का कर लिया है। महिलाओं के 75 किग्रा भार वर्ग में सीधे बाय मिलने के कारण लवलीना सीधे सेमीफाइनल में पहुंच गई हैं।

मेडल का दबाव खत्म होने पर लवलीना ने कहा कि उनका एकमात्र लक्ष्य अब देश के लिए केवल गोल्ड मेडल जीतना है और वे बिना किसी दबाव के रिंग में उतरेंगी। पिछले दो कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक से चूकने वाली और कई मुकाबले लड़ने वाली लवलीना के लिए यह सीधे सेमीफाइनल का रास्ता किसी सरप्राइज से कम नहीं था। 28 साल की लवलीना ने कहा कि उनके लिए भी यह खबर चौंकाने वाली थी, क्योंकि पिछले टूर्नामेंट्स में उन्हें 4 से 5 मैच खेलने पड़े थे।

पेरिस ओलंपिक के बाद कठिन दौर से गुजरने वाली असम की इस मुक्केबाज ने माना कि यह उनकी कड़ी मेहनत और निरंतर अभ्यास का ही फल है।